अपने घर के बड़े होते हैं ये छोटू

रात के करीब 10 बज चुके थे I पेट में चूहों ने घमासान मचा रखा था I सुबह से गाड़ी चलाते-चलाते हालत ख़राब हो चुकी थी I दरअसल हम बीती रात को ही अहमदाबाद में शूटिंग के लिए कुछ लोकेशन देखने निकल आये थे और अब मुंबई वापिस जा रहे थे I अच्छा हुआ मेरा साथी प्रकाश भी मेरे साथ ही था, नहीं तो अकेले इतनी लम्बी ड्राइविंग करना मुश्किल हो जाताI हमारी नज़र हाईवे के साथ ही बने एक छोटे से ढाबे पर पड़ी I हम वहां खाना खाने के लिए रुक गए I ढाबे के बाहर ही करीब 8-10 टेबल कुर्सियां लगे थे और हाईवे से निकलती तेज़ रफ़्तार गाड़ियों की आवाजें भी मन को भा रही थी I

गर्मियों के दिन थे I मैं और प्रकाश हाथ मुँह धोने के बाद बाहर ही लगे एक टेबल पर बैठ गए I गर्मियों में रात को खुले आकाश के नीचे बैठ कर खाना खाने का मज़ा ही कुछ और होता है I इतने में किसी ने फर्राटा पंखा हमारी तरफ घुमा कर रही सही कसर भी पूरी कर दी I अपने आपको रिलेक्स करने के लिए मैं आँखें बंद करके कुर्सी पर पीछे की और सिर रखकर बैठ गया और प्रकाश मोबाइल पर गेम खेलने में बिजी हो गया I तभी किसी की कड़क आवाज़ सुन कर मेरी निंद्रा टूटी I “ए छोटू …. कितना टाइम लगाएगा…? जल्दी ला ना आर्डर ..I”

मैंने अपने बाएँ और मुड़कर देखा I पुलिसिया सी कद-काठी वाला 35-40 के आस-पास की उम्र का एक आदमी, औरत और करीब 7-8 साल का बेटा और 2-3 साल की बेटी को गोद में बिठाए ढाबे की रसोई की तरफ घूरे जा रहा थाI अचानक से उसने राहत की लम्बी सांस ली I मैंने रसोई की तरफ देखा तो एक बड़ी सी ट्रे में खाना लिए बड़ी-बड़ी आँखों वाला, सांवले से रंग का, दुबला-पतला सा, निकर-कमीज़ और अपने पैरों से काफी बड़ी टूटी हुई चप्पल पहने 10-12 साल का एक लड़का तेज़ क़दमों के साथ मेरे बाएँ बैठे परिवार की ओर बढ़ते हुए बड़े ही प्यार से बोला…. “लीजिये साहब आ गया आपका खाना” I शायद यही छोटू था I वहां खाना परोस कर वो सीधा हमारे पास आर्डर लेने आ गयाI प्रकाश ने जैसे ही उससे पूछा की क्या-क्या है खाने में तो उसने एक ही सांस में सारी सब्जियों के नाम गिनवा दिए I मैं बस एक टक उसे देखे जा रहा था I प्रकाश अभी सोच ही रहा था कि क्या मंगवाया जाये I अब उसने मेरी तरफ देख कर पूछा कि क्या लाऊं साहब ? कुछ देर के सन्नाटे के बाद मैंने पूछा… बेटा क्या नाम है तुम्हारा? उसने शायद इस तरह के प्रश्न की कोई कल्पना ही नहीं की थी, और वैसे भी उसका असली नाम जानने की कभी किसी ने कोशिश ही कहाँ की होगी…!

उसकी आँखों में आई चमक साफ़ दिख रही थी I चेहरा खिलखिला उठा और बहुत ही ख़ुशी से अपनी भावनाओं को सहेजते हुए बोला…”राजू” I प्यार से मेरी माँ मुझे राजू बुलाती है साहब I क्यूँ तुम्हारे बाबा क्या किसी और नाम से बुलाते हैं तुम्हें …! मैंने मुस्कुराते हुए उसे हंसाने के मकसद से पूछा I नहीं-नहीं साहब, मेरा नाम राजू बाबा ने ही रखा था I पर अब वो मुझसे बात नहीं करते I बस दूर-दूर से ही देखते रहते हैं, कहते हुए राजू ने आसमान की तरफ ऊँगली करते हुए कहा – वो जो सबसे बड़ा और चमकीला तारा है न साहब वो ही बाबा हैं I

माँ ने बताया था कि यहाँ मजूरी बहुत कम है, पर वहां आसमान में बहुत सारा काम चल रहा है और मजदूरी भी बहुत अच्छी मिलती है I लेकिन वहां कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं जा सकता I आसमान वाले खुद ही अच्छे ओर काम करने वाले लोगों को चुनकर बुलाते हैं वहां I इसीलिए बाबा को भी बुलाया I कहते हुए राजू कहीं खो सा गया और कुछ सेकेंड के लिए चुप हो गया I

मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था क्यूंकि अनजाने में ही सही पर मेरी बातों ने उस मासूम बच्चे को ख़ुशी की बजाय उदासी की तरफ धकेल दिया था I माँ मुझे अब भी बच्चा समझती है साहब… वो सोचती है कि मुझे कुछ नहीं पता…. और मैं उसे सच बताना भी नहीं चाहता I हम हर रोज़ सोने से पहले दिन की सारी अच्छी-बुरी बातें बाबा को बताते हैं I मैं जानता हूँ कि चमकता सितारा बाबा नहीं हैं पर सच कहूँ साहब… उस से बात करके दिल हल्का सा हो जाता है I राजू ने मासूमियत और बड़ी ही सहजता के साथ सब कह डालाI

मैं सुन्न सा कुर्सी पर सीधा बैठा ऐसा महसूस कर रहा था जैसे किसी विषैले सर्प ने मुझे डस लिया हो I प्रकाश ने मौके के नज़ाकत को भांपते हुए कहा … तो राजू बेटा आज हमें अपने ढाबे की सबसे स्पेशल डिश खिलाओगे… ?

क्यूँ नहीं साहब…. और वो रसोई में चला गया आर्डर बताने I प्रकाश फिर से मोबाइल गेम में बिजी हो गया I मै अब भी बस उसी के बारे में सोच रहा था I बाल-मजदूरी को देश से ख़त्म करने वाली खोखली बातें दिमाग में घूमने लगी और मेरा दिल लगातार उस माँ को कोस रहा था जिसने इस मासूम से बच्चे को ऐसी ज़िन्दगी जीने पर मज़बूर किया है I मैं मन में उठे इन सवालों के जंगल में उलझता ही जा रहा था की राजू आकर बोला – साहब बस 10 मिनट लगेंगे…. खाना तैयार होने में I

ये ढाबे का मालिक तुम्हें पैसे-वैसे भी देता है या बस यूँही तुमसे काम करवा रहा है ? मैंने बाल मजदूरी के पक्ष को जानने के लिए पुछा I

हाँ-हाँ साहब… मालिक बहुत अच्छे हैं I मुझे भी बड़ों के बराबर ही पगार देते हैं I पहले तो मुझे रखने को तैयार ही नहीं थे कि पुलिस वाले तंग करेंगे, बच्चों से काम करवाने के जुर्म में I पर बहुत हाथ-पैर जोड़कर और मेरी कहानी जानने के बाद मुझे रखने को राज़ी हुए थे मालिक I और तो और माँ के लिए खाना भी यहीं से ले जाने को बोला है मालिक ने I मेरा गुस्सा अब उसकी माँ पर और बढ़ चुका था I

राजू तुम्हारी माँ क्या करती है? मैंने बात आगे बढ़ाते हुए पुछा I पहले तो वो भी बाबा के साथ ही मजूरी किया करती थी साहब, पर बाबा के जाने के बाद वो भी बीमार रहने लगी है I डाक्टर कहते हैं उसे कोई केंसर नाम का बुखार है … उसने बड़ी ही मसूमियत से कहा I मेरे मन में उठने वाले सभी सवालों के जवाब मुझे मिल चुके थे और मैं बेबस सा एक बचपन को मिटते हुए देख रहा था I

खाना खाने के बाद चलते वक़्त मैंने एक सौ का नोट राजू की तरफ बढ़ाते हुए कहा लो बेटा ये तुम्हारे लिए है… क्या लोगे इससे ? उसने झट से जवाब दिया कि माँ की चप्पल टूट गयी है  साहब… वही लाकर दूंगा माँ को, बहुत खुश होगी माँ I मैंने मुस्करा कर उसकी और देखा और हम साथ ही खड़ी अपनी गाड़ी की और चल दिए I

गाड़ी में बैठकर देखा तो राजू अब भी वहीँ खड़ा था I उसने बड़ी ही ख़ुशी से हाथ उठाकर मुझे सलाम किया और फिर अपनी टूटी हुई चप्पल की बद्दी को पैर के अंगूठे और ऊँगली के बीच दबाये  तेज़ कदमों से चलते हुए अगला आर्डर लेने चला गया I मैं एक टक उसकी टूटी चप्पलों को देखे जा रहा था I सच में ये जो “छोटू” होते हैं वो असल में अपने घर ओर दिल के बहुत बड़े होते हैं I

सतिन्द्र कुमार ‘साहिल’

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