मेरी बिटिया… मेरी डॉक्टर – 2

अगले दिन ऑफिस में लंच के समय जब मैं और अभय अकेले थे तो मौका देख मैंने उससे कहा कि यार… “कल शाम को तुम्हारी बिटिया से मिल कर दिल खुश हो गया I कितनी प्यारी बच्ची है , बिल्कुल नहीं शर्माती और कितने अदब से बात करती है I बहुत खुशनसीब हो तुम जो इतनी प्यारी बेटी दी है भगवान ने तुम्हें I (निराशा से) काश …. मेरी बेटी भी इतनी समझदार होती तो कितना अच्छा होता …!” अभय ने आश्चर्य से पुछा “मतलब ….. मैं कुछ समझा नहीं….?”

मतलब ये कि मेरी बेटी मिनी पांच साल के ऊपर की हो गयी है, एक-दो साल बड़ी ही है सलोनी से… पर समझदारी के मामले में सलोनी मिनी से कहीं आगे है I मैं जब घर जाता हूँ तो मिनी किताब लेकर ऐसे दुबक कर बैठ जाती है जैसे कि सदी की सबसे होशियार बच्ची हो I जबकि ऐसा भी कुछ नहीं है I अभय ने बड़े ही सहज भाव से कहा “ सचमुच…. ऐसा तो नहीं होना चाहिए….! ये तो बहुत ग़लत बात है, पर क्या घर पहुँचने पर कभी भी मिनी ने ख़ुशी से तुम्हारा स्वागत नहीं किया, कभी दौड़कर तुम्हारे पास नहीं आई ?”

मुझे याद आया कि जब मिनी एक साल से भी कम उम्र की थी तो भी वो मेरे मोटरसाइकिल  की आवाज़ को बखूबी पहचानती थी I गली से न जाने कितनी ही मोटरसाइकिलें निकलती थी, कई बार तो घरवाले ही धोखा खा जाते थे पर मिनी न जाने कैसे सिर्फ मेरे आने की आवाज़ सुनकर ही दरवाजे की तरफ देख ख़ुशी से पा….पा…..पा…. की रट लगाया करती थी I फिर मैं अन्दर आकर जब तक उसे गोद में उठा न लूं चैन नहीं लेती थी I कभी मैं उसे गोद में ले लेता तो कभी बस ऐसे ही थोडा प्यार देकर बाकि कामों में उलझ जाता I कुछ समय बाद जब वो आराम से चलने और बोलने लगी तो भी वो दौड़कर मेरे पास आती पर मुझपर अक्सर ऑफिस या घर की चिंतायें इतना हावी होती कि मैं दिल से उसे मिल ही नहीं पाता था I एक बार तो जब वो दौड़कर मेरी गोद में चढ़कर मुझे अपनी कोई बात बताना चाहती थी तो मैंने लगभग डांटने के अन्दाज में उसे कह दिया कि बेटा पापा जब ऑफिस से आते हैं तो बहुत थके हुए होते हैं, आते ही अपनी बक-बक न शुरू किया करो I तभी से मेरे घर आने की ख़ुशी उसके चेहरे चेहरे से गायब सी हो गयी I पापा-पापा कहते हुए दोनों हाथ फैलाए मेरी तरफ दौड़ कर आना तो उसने बहुत पहले ही बंद कर दिया था I अब तो बस कभी कभार स्कूल और पढाई के बारे में ही उससे कुछ पूछना होता है I मैं शायद कुछ समय के लिए अतीत में कहीं खो गया था , मैंने सब अभय को बताया I

सच में कितने खुशनसीब हो तुम राजीव जो मिनी जैसी प्यारी बेटी दी है भगवान ने तुम्हें I मिनी ने ये जाना कि वो अनजाने में तुम्हें परेशान कर रही है और इसीलिए अपनी खुशियों की परवाह न करते हुए उसने तुमसे दूरी बना ली ताकि तुम खुश रह सको या कम से कम उसकी वजह से तुम्हें कोई दुःख न पहुंचे I

मैंने अनजाने ही कुछ समय के लिए अपने डॉक्टर, अपनी बेटी को खुद से दूर कर लिया था I इस वक्त मैं साफ़-साफ़ देख पा रहा था कि असल में नासमझ कौन था….. मिनी या मैं ?

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