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मेरी डॉक्टर-1

कुछ दिन पहले ऑफिस के बाद किसी जरूरी काम से मेरे साथी अभय के साथ उसके घर जाना हुआ I पूरा दिन एक के बाद एक मीटिंग और ऊपर से बॉस का काम को लेकर प्रेशर अलग….! सिर दर्द से फटा जा रहा था I दरअसल मैं और अभय एक प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग का काम करते हैं I अभय ने हाल ही में हमारी कंपनी ज्वाइन की है I अभय सांवले रंग का सामान्य सी कद काठी वाला साधारण सा इंसान है, पर उसके चेहरे पर हमेशा रहने वाली मंद सी मुस्कान उसे सब से अलग बनाती है I

घर पहुँच कर अभय ने जैसे ही डोर बेल बजा कर दरवाज़ा खोला, एक 3-4 साल की प्यारी सी बच्ची दोनों हाथ फैलाये  पापा आ गए ….. पापा आ गए…… चिल्लाते हुए अभय की तरफ दौड़ते हुए आई I अभय ने भी दोनों बाहें खोल कर पूरी उत्सुकता से उसका स्वागत किया और गोद में उठा कर प्यार से चूमा और “Love you beta” बोला I मैंने देखा कि जैसे ही अभय ने उसे चूम कर “love you beta” बोला वो बच्ची अभय की छाती से लिपट गयी और पूर्ण सुरक्षा के अधिकार और एहसास के साथ उसके कंधे पर अपना सिर रख लिया I इस सब में मुश्किल से पांच से दस सेकंड का समय ही लगा होगा I अभय उसे गोद में लिए ही ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ने लगा और मैं भी धीरे-धीरे उसके पीछे अंदर आ गया I वो दोनों अभी भी एक दूजे में खोये हुए थे I अन्दर आ कर अभय ने बड़े प्यार से उसे नीचे उतारा और दोनों हाथों से उसके चेहरे को पकड़ माथे को चूमते हुए बोला “thank you so much beta…. Papa is feeling awesome now…!”

अभय को अचानक मेरा ख्याल आया और बोला “अरे यार खड़े क्यूँ हो ….? बैठो न…I मैं सोफे पर बैठ गया I अब अभय ने हम दोनों को मिलवाया और बोला “बेटा ये राजीव अंकल हैं, और ऑफिस में हम दोनों साथ काम करते हैं I बिटिया ने बड़े ही प्यार से मुझे “हेलो अंकल” बोला और मैंने भी उसे हेलो कहा I मन ही मन मैं सोच रहा था कि काश मेरी बेटी भी इसकी तरह समझदार होती..! अब अभय ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा और राजीव ये है मेरी सबसे प्यारी दोस्त, मेरी डॉक्टर, मेरी बेटी सलोनी I “अच्छा तो बिटिया को बड़ा होकर डॉक्टर बनाने का इरादा अभी से बना लिया …?” मैंने तपाक से कहा I “नहीं-नहीं अंकल, मैं तो बस अपने पापा की डॉक्टर हूँ….” सलोनी ने गर्व से कहा I

सच में राजीव पूरा दिन चाहे कैसा भी बीता हो, कितनी भी चितांए हो, कितनी भी थकावट हो पर घर पर आते ही मेरी बेटी जब मुझे गले से लगाती है सारी की सारी थकावट और सब चिंताएं न जाने कहाँ गायब हो जाती हैं I बिल्कुल तरो-ताज़ा महसूस करता हूँ मैं I इस तरह से हुई न मेरी बेटी मेरी डॉक्टर..!  है ना बेटा…. ?  “Yes Papa….” सलोनी ख़ुशी से बोली और दोनों ने एक दूसरे को हाय-फ़ाय दिया I

घर वापिसी के वक़्त सारे रास्ते मैं भगवान् को कोसता रहा कि काश मेरी मिनी भी इतनी समझदार होती…! पर मेरी मोटी खोपड़ी में ये बात अभी तक नहीं घुस पा रही थी कि असल में नासमझ मेरी बच्ची नहीं बल्कि मैं था I खैर… कैसे मुझे इस बात का एहसास हुआ अगली कहानी में बताऊंगा I

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